Saturday, December 10, 2016

अर्थशास्त्र नहीं झटका शास्त्र--3: थैचर के बिग बैंग के झटके से तबाह ब्रिटेन

चिली और ब्राज़ील में इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति के बाद मिल्टन फ्रीडमन और उनके सहयोगियों का दबदबा बन चुका था। वे अब यह भी प्रचारित करने में लग गए कि पूँजी की स्वतंत्रता ही व्यक्ति की स्वतंत्रता को पुष्ट करती है। स्वतंत्रता के नाम पर राज्य द्वारा लुटेरों को खुली छूट तभी मिल जाती लेकिन १९७१ में अमरीका में पुनः मंदी छाने लगी थी और राष्ट्रपति का चुनाव नजदीक आ रहा था। निक्सन ---जो कि फ्रीडमन के करीबी थे और डोनाल्ड रमजफील्ड समेत दर्जनो शिकागो स्कूल के लोगों को अपनी सरकार में नियुक्त कर रखा था ---चुनाव जीतने के लिए यहाँ फ्रीडमन की नीतियों से यू-टर्न ले लिया। उन्होंने अपने देश में सरकारी सख्ती करते हुए मूल्य नियंत्रण की नीति अपनायी। ऐन चुनाव के पहले उसका असर भी हुआ और वे भारी बहुमत से जीत गए।
ध्यान देने की बात यह है कि लैटिन अमेरिका के जिन देशों में मुक्त बाजारी अर्थव्यवस्था थोपी गयी वहां या तो फौजी तानाशाही थी या उसे हिंसा द्वारा स्थापित किया गया था। इसी से इसके पैरोकारों का छल स्पष्ट हो जाता है, जो यह कहते रहे हैं कि इससे सभी स्वतंत्र और संपन्न बनेंगे। दरअसल व्यक्तिगत स्वतंत्रता की आड़ में यह जनता के साथ की गयी एक अपराधिक कार्यवाही थी।
निक्सन और उनके बाद फोर्ड के कार्यकाल के दौरान अमेरिकी अर्थव्यवस्था में फ्रीडमन के गुर्गों ने गहरी पैठ बनायी और अपनी पकड़ मजबूत की, जिसका असर १९८० में रोनाल्ड रीगन के राष्ट्रपति बनाने के बाद स्पष्ट रूप से दिखने लगा।
इसी बीच ब्रिटेन में १९७९ में मार्गरेट थैचर प्रधानमंत्री चुनी जा चुकी थीं; जिनके गुरु फ्रेडरिक वोन हायेक थे, जो कि फ्रीडमन के भी गुरु थे और मोंट पेलेरिन सोसाइटी के कर्ता-धर्ता भी। रीगन के साथ फ्रीडमन और इधर थैचर के साथ वोन हायेक ने मिलकर अमेरिका और ब्रिटेन दोनों देशों ने समूचे विश्व में "झटका सिद्धांत" का प्रयोग दोहराया और मुक्त अर्थ व्यवस्था का बीज रोपते गए जो आज विकराल रूप ले चुका है।
थैचर ने आते ही न केवल कॉर्पोरेट टैक्स कम किये, सरकारी खर्चों में भी कटौती की वरन बड़े पैमाने पर सरकारी और अर्ध सरकारी उद्यमों को डिसइनवेस्टमेंट के माध्यम से पूंजीपतियों को सौंपने का क्रम चालू किया। नतीजा बेरोजगारी दुगुनी हुयी और ब्रिटेन में हड़तालें शुरू हो गयीं। अब थैचर की घटती लोकप्रियता को वापस लाने और उभरते जन असंतोष को दबाने या भटकाने का समय आ गया था इसलिए जनता को झटका देने की तैयारी की जाने लगी। झटके की कामयाबी के जरूरी था कि पहले कोई मुसीबत पैदा की जाये या किसी छोटी मुसीबत को बढ़ा कर इतना बड़ा किया जाये की जनता घरेलू परेशानिया भूल कर उन पर ध्यान लगा दे।
इसलिए १९८२ का फ़ॉकलैंड युद्ध काम आया। फ़ॉकलैंड ब्रिटेन से हजारों किलोमीटर दूर अर्जेंटीना के पास एक द्वीप समूह है जिस पर अर्जेंटीना के दखल को बहाना बनाकर ब्रिटेन एक बेहद गैरजरूरी युध्द में कूद पड़ा। घरेलू क्षेत्र में फेल होती थैचर सरकार को देशभक्ति का डंका बजाने का यह सुनहरा अवसर था।
जाहिर है की लड़ाई दो ढाई महीने में ही खत्म हो गयी और बिगड़ती अर्थव्यवस्था और बढ़ती बेरोगारी के बीच थैचर ब्रिटेन की "लौह महिला" कहलायीं, जिसके परिणाम स्वरुप १९८३ के चुनाव में फिर उन्हें भारी जीत मिली। यानि जो समस्या राजनयिक प्रयासों से सुलझाई जा सकती थी उसके लिए एक अपेक्षाकृत कमजोर मुल्क से युद्ध करके हीरोगिरी दिखाना काम कर गया और जनता फर्जी देशभक्ति के उबाल में अपनी तकलीफें फिलहाल भूल गयी। फाकलैंड युद्ध न होता तो थैचर का चुनाव जीतना ही असंभव होता।
क्या आपको अपने यहाँ खेल जा रहा देशभक्ति का नाटक सरकार की आर्थिक मोर्चों पर असफलता को छुपाने का प्रयास नहीं लगता ?
दुबारा चुनाव जीतते ही थैचर ने अपने रंग दिखने शुरू कर दिए। १९८४ में ब्रिटेन में हुयी खदान मजदूरों की जायज और ब्रिटेन की सबसे बड़ी हड़ताल को पूरी शक्ति से इस "लौह महिला" ने कुचल दिया। इसके बाद "मोंट पेलेरिन" के एक वफादार रोबोट के तौर पर सरकार को कंगाल करने का दौर शुरू हुआ। सरकारी प्रचार तंत्र को इस्तेमाल करते हुए चमकदार विज्ञापन बनाये गए जिसको "बिग बैंग" कहा गया। लुभावने विज्ञापनों से जनता को यह सन्देश पहुचाया गया कि ब्रिटेन तरक्की और सम्पन्नता के एक नए युग में प्रवेश कर रहा है, जो कि सरासर झूठ था क्योंकि बेरोजगारी और बजट घाटा सुरसा की तरह उत्तरोत्तर बढ़ रहा था और बढ़ता ही गया ।
लुभावनी विज्ञापनबाजी की आड़ में एक-एक करके सारे सरकारी उपक्रम डिसइंवेस्ट किये गए। सबसे पहले स्टील उद्योग पूंजीपतियों के हवाले किया गया। फिर जल, बिजली, गैस, टेलेफोन, एयरलाइन, तेल और खनन एक एक करके "बिग बैंग" के तहत प्राइवेट सेक्टर में दे दिए गए।
थैचर और उधर रोनाल्ड रीगन दोनों ने इसे कभी गलत आर्थिक कदम नहीं माना बल्कि इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मुक्त समाज का परिचायक कह कर प्रचारित किया। रीगन ने तो यहाँ तक कहा कि हमारा यह स्वतंत्रता अभियान तब तक नहीं रुकेगा जब तक कि कम्युनिस्ट मुल्कों की तानाशाही और गुलामी को हम समाप्त करके व्यक्ति को पूर्ण स्वतंत्रता नहीं दिला देते।
अब ब्रिटिश और अमेरिकी पूंजीपतियों को फायदा पहुचाने के लिए कैसे अफगानिस्तान और इराक पर लड़ाई छेड़ी गयी और कैसे रूस में गोर्वाचोव को मजबूर किया जा सका ये कल ......... ।

अर्थशास्त्र नहीं झटका शास्त्र--2: चिली के बाद शुरू हुए दूसरे खेल

आपको केवल दो तरह से ही कोई लूट सकता है--फुसलाकर या फिर डरा धमकाकर। रोजमर्रा की जिंदगी में झूठे वादों और मनभावन नारों से आप फुसलाये जाते हैं परन्तु जब बाजार में मंदी आने हो होती है तो राजा कोई न कोई ऐसा व्यूह रचता है कि मंदी दूर हो और व्यापारियों को पूंजी वृद्धि के लिए नए मौके मिलें।

यही काम देश में होता है। यही काम अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में होता है।

फुसलाने या फिर डराने-धमकाने----इन दोनों अवस्थाओं में मनुष्य की प्रतिरोधक और निर्णय शक्ति कमजोर या शून्य (चलिए सुन्न समझ लीजिये) हो जाती है। फुसलाने की कार्यवाही में वह अपनी वास्तविक स्थिति के कट कर भटक जाता है और तमाम गैर जरूरी उत्पाद खरीदता हुआ लुटता रहता है जबकि डरी हुई अवस्था में वह आपद्धर्म की आड़ में या विकल्पहीनता के चलते कुछ भी स्वीकारने को आसानी से तैयार हो जाता है।

चूँकि हम अभी झटका सिद्धांत की बात कर रहे हैं तो इसलिए अपनी बात डरने-डराने की कार्यवाही, उसके तौर-तरीकों और उदाहरणों पर ही केंद्रित रखेंगे। नोबेल पुरस्कार से नवाजे गए मिल्टन फ्रीडमन अपने संगठन के माध्यम से यह पोंगा और भ्रामक सिद्धांत प्रचारित करने में सफल हुए कि "शासन द्वारा खुली छूट मिलने पर अर्थव्यवस्था अपने को स्वयं नियोजित करती चलती है और किसी संकट कालीन अवस्था में भी अपने विकल्प स्वयं ढूंढ लेती है।" इसी के साथ उन्होंने इस समीकरण को उलट कर दूसरी तरफ से भी सिद्ध करना शुरू कर दिया कि "संकटकालीन अवस्था ही अर्थव्यवस्था के विकास के लिए सबसे अधिक मुफीद पड़ती है।"

उनकी यह उलटवाँसी अमेरिकी पूंजीपतियों की नजर में चिली के प्रयोग दौरान सही साबित भी हो गयी, इसलिए पूँजी के संसार ने इसे एकदम से लपक लिया और उसका ध्यान सामान्य व्यापार से थोड़ा हट कर इस बात पर भी लगने लगा कि विश्व में संकट कहाँ है?--और यदि नहीं है कब, कहाँ और कैसे उसे वाजिब खर्च में पैदा किया जा सकता है। अब देखिये की चिली में सफल होने के बाद किस तरह दुनिया में संकटों का व्यापार शुरू हुआ और दनादन सफल होता हुआ आज भी जारी है।

सरकारी नियंत्रण से मुक्त अर्थात खुले बाजार के वकील कभी भी चिली की बात नहीं करते। वे हमेशा रीगन और थैचर के युग से अपनी रामायण बांचना शुरू करते हैं क्योंकि चिली की बात करते ही उनके नाखून काढ़ने की प्रक्रिया दिखने लगती है। जब कि रीगन और थैचर से बात शुरू करने पर वह ढक जाती है। क्योंकि रीगन और थैचर द्वारा संकट पैदा करने के लिए विध्वंस की कार्यवहियाँ देशभक्ति या अन्तरराष्ट्रीय शांति स्थापित करने के प्रयासों की आड़ लेकर की गयी थीं और उनकी स्वीकार्यता के लिए संगठित प्रचार तंत्र काम में लिया गया था। जब कि चिली में यह काम कुछ नौसिखिये ढंग से किया गया था और वहां की तोड़ फोड़ को सही साबित करने के लिए कोई झूठा या सच्चा बहाना पहले से ईजाद नहीं हो पाया था।

चिली के बाद शिकागो के मुक्त बाजार वादियों ने अमेरिकी सरकार की मदद से ब्राज़ील, उरुग्वे और अर्जेंटीना में अपना खेल दिखाना शुरू किया जिसकी परिणति १९७६ में अर्जेंटीना के हिंसक तख्ता पलट के रूप में हुई और इसके दौरान भारी संख्या में छात्रों, बुद्धिजीवियों और कामगार यूनियन के लोगो को भयंकर अमानवीय यातनाएं देते हुए मौत के घात उतार दिया गया। उस समय के सेक्रेटरी ऑफ़ डिफेंस डोनाल्ड रमजफील्ड की योजना के अनुसार इन संहारों के फलस्वरूप अनाथ हुए अबोध और गर्भवती महिला कैदियों के जन्मे बच्चों को राज्य के संरक्षण में लेकर सैनिकों और जासूसों के रूप में ट्रैन किया गया। जाहिर है कि इन बच्चों की कोई सांस्कृतिक, सामाजिक या पारिवारिक स्मृति न होने के कारण इन्हे जान पर खेल जाने या किसी भी कार्यवाही में किसी किभी तरफ से युद्ध या जासूसी में झोंका जा सकता था; और बाद में किया भी यही गया।
अब एक बात यहां ख़ास तौर पर याद रखने ही है कि आतंक के साये और तानाशाही व्यवस्था में ही लैटिन अमेरिकी देशों में मुक्त बाजार की अर्थव्यवस्था को लागू किया जा सका था; जब आम लोगों की प्रतिरोधक और निर्णय शक्ति अपने निम्नतम स्तर पर थी।

साथ में यह भी याद रखिये कि इन्हीं डोनाल्ड रमजफील्ड ने बाद के दशकों में अमेरिका द्वारा मध्यएशिया और दूसरे हिस्सोंमें फैलाई गयी विध्वंसक कार्यवाहियों में कितनी जरुरी भूमिका निभायी।

उन दिनों से रोज सुबह सरसरी तौर पर भी अगर आप अखबार पढ़ते रहे हैं या फिर पीछे पलट कर सिर्फ मोटी मोटी घटनाओं के क्रम को तलाश लें तो आपको बड़े आराम से यह दिख जायेगा कि पहले किस प्रकार युद्ध या आर्थिक नाके बंदी के बहाने संकट पैदा करके लोगों की निर्णायक और प्रतिरोधक शक्तियां क्षीण की जाती हैं, राजनैतिक उथल पुथल पैदा की जाती है और फिर उनकी जमीन पर मनमर्जी का व्यापार खड़ा किया जाता है, जिसका वितान वेश्यावृत्ति से लेकर तमाम गैर जरूरी दैनिक उत्पादों, हथियारों की विक्री और निर्माण उद्योग तक फैला-फूला है।

तीन उदाहरण ही काफी होंगे-मध्यएशिया, ब्रिटेन और रूस--जिनकी संक्षेप में चर्चा हम शुक्रवार को करेंगे। संक्षेप में इसलिए कि इस पोस्ट का उद्देश्य आपको सिर्फ चीजों की रुपरेखा बताना है, इनके आपसी रिश्तों को साफ़ और स्पष्ट करते हुए; जिससे आप आज के हिन्दुस्तान में हो रही घटनाओं में वह साजिश पता कर सकें जो कश्मीर, पाकिस्तान, हिन्दू-मुसलमान, अम्बानी-अडानी, मेक-इन-इंडिया, बुलेट ट्रैन और विध्वंसक विकास के नारों की आड़ लेकर हो रही है।

राजनीति, पत्रकारिता, मनोरंजन, साहित्य के अलावा जन-जीवन के दूसरे क्षेत्रों में ऐसे प्रयास लगातार हो रहे हैं जो हमारे सहज बोध को समाप्त कर, निर्णय शक्ति और प्रतिरोध को कुंद करने का काम कर रहे हैं। .

हमारे यहाँ अभी यह फुसलाने का दौर है, फुसलाकर लूटने का, यदि हम उनके फुसलाने में नहीं आये तो हिंसा भी प्रायोजित की जा सकती है।

अर्थशास्त्र नहीं झटका शास्त्र--1 : प्रायोजित हादसों द्वारा जन चेतना का विध्वंस

 जब भी जिंदगी में जोर का झटका लगता है तो कैसा लगता है, महसूस तो किया होगा ?
लेकिन क्या ठीक-ठीक बता सकते हैं कि उस समय कैसा लगा था ? 
यदि आपकी निर्णय शक्ति लगभग सुन्न पड़ गयी हो और आपकी प्राथमिकताएं अचानक बदल गयी हों तो कोई आश्चर्य नहीं, क्योंकि यह तो एकदम स्वाभाविक ही है।

अच्छा एक बात बताइये, कि मानसिक रोगियों के उपचार के समय डॉक्टर उन्हें कभी-कभी बिजली का झटका क्यों देते हैं ? 
"शायद उनके मौजूदा व्यवहार सम्बन्धी मानसिक सन्दर्भों (या खलल) को मिटाने के लिए जिससे बाद में उसमें नयी ट्रेनिंग द्वारा नयी सूचनायें दर्ज कर व्यक्ति को सामान्य बनाया जा सके।"---आपका जवाब एकदम सही है।
अब यह सोचिये कि यदि हमें पता चले कि हमारी सरकारें और पूंजी के रखवाले हमारे साथ कुछ ऐसा ही व्यवहार कर रहे हैं कि जैसा डाक्टर मानसिक रोगियों के साथ करता है तो?
या कि हम जीवित और स्वस्थ मनुष्यों को बनावटी, प्रायोजित झटके दिया जा रहे हैं तो?
या फिर हमें बनावटी और प्रायोजित झटके दे-दे कर हमारे हुक्मरान हमें मानसिक रोगी बनाने में सफल हो रहे हैं तो?

जवाब आप खुद सोचिये क्योंकि किसी और के दिए जवाब से अब आपका काम नहीं चलने वाला।

हम अपने विषय की शुरुआत एक ऐसे प्रयोग की चर्चा के साथ करते हैं जो कनाडा के मैकगिल विश्वविद्यालय में डॉ यू. एन. कैमरोन किया। यह प्रयोग उनके पूर्ववर्ती डॉ डोनाल्ड हेब की अवधारणा को स्थापित करने के लिए और उस पर आगे क्रियात्मक विधियां विकसित करने के लिए किया गया जिसमें पश्चिमी देशों की प्रमुख जासूसी एजेंसियों की सहमति और सहयोग शामिल था। उन एजेंसियों ने अपने १९५१ में मॉन्ट्रियल के एक होटल में गुपचुप किये गये अपने सम्मलेन में डॉ डोनाल्ड हेब की अवधारणा को अपने लिए बेहद उपयोगी पाया था और इसे आगे विकसित करने और इसलिए इसे इस्तेमाल लायक बनाने का ठेका डॉ यू. एन. कैमरोन को दिया।

तो क्या थी डॉ डोनाल्ड हेब की अवधारणा ? डॉ हेब ने स्थापित किया था कि "यदि मनुष्य की चेतना को किसी भी प्रकार से आकस्मिक झटके दिए जाएं और उन झटकों की तीव्रता औसत से बहुत अधिक हो, या फिर वे झटके उसे लम्बी अवधि तक दिए जाएं तो उसकी संवेदना, स्मृति, प्राथमिकताओं और निर्णय शक्ति पर मारक असर पड़ता है। "

डॉ कैमरोन ने इस अवधारणा को विकसित करने के लिए एलन मेमोरियल इंस्टिट्यूट स्थित अपनी प्रयोगशाला में अत्यंत दुर्दांत और अमानवीय तरीके से जीवित मानसिक रोगियों को स्पेसिमेन मानते हुए सैकड़ों प्रयोग किये जिनमें अनेकों की मृत्यु हुयी और बहुत कम जिन्दा बचे। अंत में प्रयोग सफल रहा और यह स्थापना पुष्ट हुयी कि मनुष्य की चेतना को पहुंचाए गए आकस्मिक और तीव्र झटकों से मनुष्य की मौजूदा संवेदना, स्मृति, प्राथमिकताओं, निर्णय शक्ति और प्रतिरोधक क्षमता को पूर्णरूपेण समाप्त कर उसका नए ढंग से पुनर्लेखन संभव है।

इस जानकारी का उपयोग सबसे पहले सीआईए ने अपने बंदियों से विरोधी एजेंसियों की सूचनायें उगलवाने के लिए करना शुरू कर दिया। सीआईए ने इस पर एक विस्तृत मैन्युअल भी बनाया जो काफी समय तक उसके सीक्रेट ऑफिसियल इंटेरोगेशन मैन्युअल के रूप में प्रतिष्ठित रहा। हालाँकि इन विधियों का सत्यापन तो कनाडा में हुआ लेकिन क्योंकि प्रयोगशाला की फंडिंग संयुक्त थी इसलिए दूसरी एजेंसियों ने भी से अपने-अपने ढंग से सफलता पूर्वक अपनाया।

अब आप अर्थसत्ता की पहली कड़ी याद कीजिये जहाँ हमने शिकागो विश्वविद्यालय के मिल्टन फ्रीडमन की चर्चा की थी। इस प्रयोग के ही अनुरूप उन्होंने एक आर्थिक अवधारणा बनायी थी, जिसमे कहा गया था कि बीमार अर्थव्यवस्था को भी मानसिक रोगियों की ही भांति आर्थिक झटका देकर क्रान्तिकारी ढंग से पुनर्लिखित किया जा सकता है। यही वह समय था जब उसने अपने ऑस्ट्रियन गुरु फ्रेडरिक वोन हायक के साथ मिलकर दुनिया के शीर्ष अर्थशास्त्रियों को इकठ्ठा किया और मोंटे पेलेरिन के सम्मलेन के बाद मुक्त अर्थव्यवस्था की बीन बजानी शुरू की।

उसके बाद मिल्टन फ्रीडमन के झटका सिद्धांतों को ही आजमाने के लिए चिली में कृत्रिम आर्थिक संकट पैदा किया गया, जन सामान्य को आर्थिक किंकर्तव्यविमूढ़ता की अवस्था में पहुचाया गया और फिर उनकी सारी स्मृतियों को धो पोंछ कर नयी आर्थिक इबारत लिखी गयी। हमें समझ लेना चाहिए कि यह अमेरिका द्वारा किया गया पहला प्रयोग था जिसे आज तक विभिन्न मुल्कों में आजमाया जा रहा है।

अब यह भी देखिये कि राजनीति, अर्थजगत और मानव व्यवहार के शीर्ष पर एक साथ एकमेव अथवा पूरक सिद्धांत कैसे जन्म लेते हैं और उनका प्रयोग निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए हर कहीं कैसे किया जाता है। यही नहीं उनके परिणामों पर भी गौर कीजिये तो आप पाएंगे कि हम आम लोग उनके लिए केवल गिनीपिग हैं और यह दुनिया उनकी विशाल प्रयोगशाला।उनके सिद्धांत, उनके उपकरण और उनकी विधियां हमें समय समय पर उपयुक्त झटका देती, हमारी सांस्कृतिक स्मृतियां और वरीयताएं ध्वस्त करती, हमारी निर्णय क्षमता को अपने पक्ष में मोड़ती कितनी सफल हैं और हमारा प्रतिरोध एक असहाय चीत्कार के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। 

मुद्रा के आविष्कार की अमर कहानी

कहानी काल्पनिक है, लेकिन क्या सच में ऐसा ही नहीं हुआ होगा?

एक बस्ती थी जिसमें करीब सौ लोग रहते थे.
कुछ अनाज उगाते, कुछ गाय-भेड पालते, कुछ मछलियाँ पकड़ते, कुछ कपडे बुनते-सीते, कुछ लकड़ी और लोहे का काम करके तरह-तरह की चीजें बनाते.
अपनी जरूरत की चीजें आपस में अदल-बदल कर काम चलाते.
लेकिन कभी-कभी कुछ दिक्कत आ जाती थी, जैसे जब किसी को जरूरत है कपडे की और उसके पास बदले में देने के लिए अनाज है लेकिन जिसके पास कपडा है उसे अंडे चाहिए.
अब इससे भी लोग जैसे तैसे निपट लेते थे जैसे कि पहले कपडे वाला अंडे वाले से अदला बदली करे फिर अनाज वाला अंडे वाले के पास जाकर कपडा ले आये.
चूंकि सब अदला-बदली ही करते थे इसलिए सबके पास कुछ न कुछ हर चीज पहुँच ही जाती थी और थोडा बहुत लोग जरूरत के हिसाब से भण्डारण भी कर लेते थे. लेकिन फिर भी इच्छित वस्तुओं को खोजने में उन्हें मशक्कत तो करनी ही पड़ती थी.

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एक दिन उस बस्ती में कोई एक बाहरी घुड़सवार आया.
उसने बस्ती के लोगों को समझाया-- "ये जो चीजों की अदला बदली में तुम्हें थोड़ी दिक्कत होती है उसका उपाय मेरे पास है." ---यह कहकर उसने हर बस्ती वाले को दस-दस छोटे पत्थर के टुकड़े दिए जिस पर एक ख़ास चिन्ह बना हुआ था और कहा कि जब भी तुम्हे कुछ चाहिये हो, चीजों को चीजों से नहीं इन टुकड़ों से बदलो.
लेकिन इसी के साथ उसने एक शर्त सुनाई. और कहा-- "मैं एक साल बाद लौटूंगा. और जब मैं लौटूंगा तो मुझे हर व्यक्ति दे दस के बदले ग्यारह पत्थर चाहिए.... पुराने पत्थर वापस लेकर दुबारा सबको एक साल के लिए दस-दस नए टुकड़े दे दिए जायेंगे और जो ग्यारह पत्थर नहीं दे सकेगा उसे अपनी संपत्ति का एक निश्चित हिस्सा मुझे देना पड़ेगा."
अपनी रोजमर्रा की परेशानी का फौरी हल निकलते पाकर लोग उसकी शर्त मान गये और घुडसवार चला गया. लोग अपने काम में लग गए.

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लोग अपने काम में लगे रहे, खाते-पीते, गाते, बजाते, नाचते उत्सव मनाते--जीवन सामान्य ढंग से चल रहा था. इसी तरह से साल पूरा होने को आ गया और घुड़सवार के वापस आने का भी समय हो हो गया और दस की जगह ग्यारह टुकड़े वापस करने का भी.
लेकिन लोगों पाया कि उनमे से सभी के पास ग्यारह टुकड़े तो है नहीं.. अदला बदली में कुछ के पास ज्यादा पहुँच गये हैं कुछ के पास कम रह गए हैं.
.. वैसे तो ग्यारह पत्थर हर के पास होने संभव भी नहीं थे क्योंकि हर एक को दिए तो दस ही गए थे ग्यारह कहाँ से आते?
अब जिनके पास पत्थर कम रह गए थे चुकाना तो उन्हें भी था इसलिए उन्होंने अपनी चीजों के बदले में ग्राहक से अधिक टुकड़े मांगने शुरू कर दिए.
यानि वस्तुओं के दाम बढा दिए.
फिर भी साल के अंत में,
किसी भी गणित से
हर बस्ती वाले के पास ग्यारह टुकड़े तो आ नहीं सकते थे,
क्योंकि वे तो कुल उतने ही थे
जितने कि घुड़सवार ने उन सब में बांटे थे .
नतीजा यह हुआ कि वायदे के मुताबिक जो सिक्के वापस नहीं कर सका उसे अपनी संपत्ति में से कुछ न कुछ उस घुडसवार को देना पड़ा.

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इस तरह, जो घुड़सवार पहले केवल पत्थर के कुछ चिन्हित टुकड़ों का मालिक था
साल भर में बस्ती की कुछ सम्पत्तियों का मालिक बन गया .
क्योंकि पूरे पत्थर न चुकाने की यवज में लोगों के पास से उनकी सम्पत्तियाँ घुड़सवार के पास चली गयीं थीं.
इस तरह समय बीतता रहा और लोग अपनी सम्पत्तियां गँवा कर, दूसरी गतिविधिया कम करके, टूकडे इकठ्ठा करने की होड़ में लग गए.
अब जिनके पास अधिक टुकड़े संग्रहीत होते वे अमीर और जिनके पास कम
हो पाते वे गरीब कहलाये जाने लगे. अब साल भर लोगों में पत्थर के उन टुकड़ों को संग्रह करने की होड़ भी लगने लग गयी .

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यही है चिन्हों यानि मुद्रा के संपत्ति में आसानी से बदल जानी की कहानी .
मुद्रा धन नहीं है लेकिन उसे धन समझ लिया गया है......
हमारे उपयोग की वस्तुएं और प्राकृतिक संसाधन ही वास्तव में धन है..
जरा इसी पैटर्न पर अपने चारों तरफ हो रही व्यापारिक गतिविधियों और संसाधनों की लूट और बैंकिंग व्यवस्था को देखिये और सोचिये .... क्या समझ में आता है ?
और अब उससे आगे ..................

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दूसरे साल के शुरू होते-होते बस्ती में नयी तरह की खलबली सी मचने लग गयी और सहज जीवन व्यवस्था में कई दिलचस्प परिवर्तन होने लगे.
अचानक ही पत्थर के उन चिन्हित टुकड़ों को हर कोई चाहने लगा था. उन्हें वास्तिवक जीवनोपयोगी वस्तुओं से अधिक प्यार करने लगा था.
लोगों में यह बोध और मान्यता पैदा होने लग गयी कि यदि आपके पास ये टुकड़े हैं तो आप कुछ भी उनके बदले हासिल कर सकते हैं. आपको अनाज उगाने, जानवर पालने, मछली पकड़ने या फिर कपडे बुनने की जरूरत नहीं; यदि आपके पास वे टुकड़े पर्याप्त हैं तो उनके बदले आप कोई भी चीज ले सकते हैं. इसलिए उन्हें इकठ्ठा करने के लिए हर कोई लालायित रहने लगा था.
जहां पहले हर व्यक्ति श्रम करके अपनी जरूरत की चीजें बनता या पैदा करता था वहीँ अब काम करने वालों की संख्या घटने लगी. नतीजतन चीजों का उत्पादन भी घटने लगा. इससे मांग और बढी और स्वाभाविक था कि जिनके पास वस्तुएं थीं उन्होंने दाम भी बढ़ा दिए.
इधर जिनकी संपत्ति का कुछ हिस्सा जा चुका था, उनकी भी उत्पादन क्षमता अब कम होने लग गयी थी.

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इस बार घुडसवार साल ख़त्म होने के पहले ही आया, और भी बहुत सारे चिन्हित पत्थर के टुकड़े लेकर और बस्ती वालों से बोला कि आपलोगों की परेशानी मुझसे देखी नहीं जाती ....तो ऐसा करो कि जिनके पास भी पत्थर कम पड रहे हों, वह मुझसे और ले ले और साल नही दो साल तीन या पांच साल बाद मुझे उसी पुराने हिसाब से बढा कर वापस कर दे.
फिर यह बात लोगों को जंच गयी और जिनके पास पत्थर कम हो गए थे या ख़त्म हो गए थे उन्होंने अपनी जमीन या घर की जमानत पर और टूकडे हासिल कर लिए.
अब चूँकि उत्पादन में पत्थरों की कोई सक्रिय भागीदारी तो थी नहीं और न ही वे किसी और इस्तेमाल में आ सकते थे इसलिए बस्ती के कुल उत्पादन पर केवल उतना ही असर पड़ा जितना अधिक लोग काम कर पाए.
लोगों ने अपने आराम और मनोरंजन के समय में कटौती की और काम का समय बढाया. इससे उनकी पारिवारिक और सामुदायिक जिंदगियां प्रभावित होनी शुरू हुयीं, और वे पहले की अपेक्षाकृत कम प्रसन्न रहने लगे, लेकिन उन्होंने फिर भी परवाह न की क्योंकि उनपर उत्पादन और विक्रय करके दिए समय के ख़त्म होने के पहले अधिक टुकड़े जमा करने का दबाव काम कर रहा था.

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इस तरह से विनिमय और उत्पादन के असंतुलन के चलते, अपना कर्ज चुकाने की प्रक्रिया में, कुछ साल बाद बस्ती में से कई लोगों के पास संपत्ति शून्य हो गयी, क्योंकि वे उसे घुड़सवार को दे चुके थे.
अब उनके पास बची थी तो केवल मेहनत कर सकने की शारीरिक क्षमता. फिर भी पत्थर के टुकड़ों की जरूरत कायम थी. इसलिए अब ये संपत्ति गँवा चुके लोग इनके बदले कुछ भी करने को तैयार थे.
इधर एक बाहरी घुडसवार के पास---जो कुछ भी लेकर बस्ती में लेकर नहीं आया था, सिवा पत्थर के कुछ चिन्हित टुकड़ों के-- संपत्ति जमा हो गयी और काम करने के लिए मजदूर भी उपलब्ध हो गए थे--जो पहले की व्यवस्था में नहीं थे.

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अब घुड़सवार बस्ती में ही रहने लगा. जब्त की गयी संपत्तियों पर अपने पत्थर के टुकड़ों के बदले लोगों से काम लेने लगा और उत्पादन भी करने लगा.
उसके पास अब गाँव के किसी भी परिवार से अधिक संपत्ति थी. वस्तुओं की सप्लाई पर उसी का नियंत्रण था. मजदूरों की जिंदगियों पर भी.
यानि पूँजी, श्रम, शोषण और गुलामी का पहले अध्याय लिखा जा चुका था.

जीवन में अर्थ: प्रेम की अनुपस्थिति, ऋण की अवधारणा, युद्ध और आर्थिकी

कहा जाता है कि जब तक जीवन है प्रेम और युद्ध जारी रहेंगे. 
दिन-रात, अच्छाई-बुराई, अँधेरे-उजाले की तरह ! 
मेरा मनना है कि यह सब कुछ ऐसे शुरू हुआ होगा

जिन्दा रहने और प्यार पाने के लिए आदमी जन्म से ही लड़ता रहा है ! 
बाकी वजहें सभ्यता के विकास के साथ इसी जमीन पर पनपती चली गयीं.
प्यार से महरूम लोग ही सत्ता हासिल करने की तरफ मुड़े और हर उस चीज पर काबिज होने के लिए दूसरे लोगों से लड़े, जो सत्ता का प्रतिनिधित्व करती थी. मेरी नजर में यहाँ भी उनका अंतिम लक्ष्य प्यार और स्वीकार पाना ही था; जो शायद पहले हासिल होता तो वे किसी तरह की लडाई में उतरते ही नहीं.
प्रेम की कमी से पैदा हुई संघर्ष की आदिम चिंगारी अब तो पूरी मानवता ही लील चुकी है, और यह आग धधकती रहे इसके वाजिब इंतजाम करने में हमारे चारों ओर सदियों कोशिशें होती भी रही हैं.
कितनी तसल्ली की बात है कि शान्ति और प्रेम की दुनिया अब मरीचिका लगने लगी है ...बाहर युद्ध जारी है ... स्थापित सत्ताओं के केंद्र ही नहीं, बल्कि हम सब भी शक्ति के अश्लील प्रदर्शन में व्यस्त हो रहे है ;जिसका अंतर्पाठ है कि " तू मुझसे कमतर है इसलिए मुझ जैसा बन या मेरे सामने झुक"
प्रेम का दरिया सूखने लगा है....उसी अनुपात में युद्ध की आग बढ़ चढ़ कर धधक रही है
.......लेकिन युद्ध का यह चरण कानफोडू धमाकों और चीखों के आर्तनाद का नहीं, बल्कि सर्वथा ध्वनिविहीन और अधिक मारक है .... जिसमे कहीं कहीं तो हम आगे बढ़ कर मृत्यु का स्वयं ही वरण कर रहे है, जैसे कि उससे ही हमें मुक्ति मिलने वाली हो !
ध्यान रहे युद्ध मुक्त नहीं करता .... वह केवल दो चीजें पैदा करता है:---
एक विजेता और दूसरा गुलाम !!

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प्रेम और ख़ुशी के घर में रहने वाले लोग कभी महलों की इच्छा नहीं करते. जिन्हें जीवन में भरपूर प्यार मिला हो और उन्होंने बांटा भी हो, उन्हें किसी भी तरह की सत्ता की भूख महसूस ही नहीं होगी.
भारतीय उपमहाद्वीप शुरू से इस मामले बहुत भाग्यशाली रहा है कि यहाँ दर्जन भर से ऊपर climatic zones हैं और हर तरह की प्राकृतिक सम्पदा के साथ मनुष्य के जीवन को आसान और सुखमय बनाने के साधनों की प्रचुरता रही है.
प्राकृतिक रूप से युरोप इतना भाग्यशाली नहीं रहा. वहां मनुष्य को जलवायु के चलते जीने मात्र के लिए सदा कठिन संघर्ष करना पड़ा, हालाँकि उसी के चलते उनमे नई खोजों और उद्योगों के विकास की वृत्ति पनपी. उद्योग जो शुरू तो मानव जीवन को आसान बनाने के लिए किये गए लेकिन बाद में युद्ध के उपकरण के तौर पर इस्तेमाल किये जाने लगे. इसीलिए यह धारणा भी कि मनुष्य के मूल में पाशविक वृत्तियाँ है और युद्ध करना उसका स्वाभाव है, यूरोपीय चिंतकों की ही देन है.
मशीनों की खोज और उद्योगों का विकास वैसे तो जीवन को आसान बनाने के लिए हुआ, जिसमे अपेक्षाकृत कम श्रम से अधिक वस्तुएं निर्मित की जा सकें, लेकिन नियंत्रण के अभाव ने इस व्यवस्था में एक भारी खोट पैदा कर दिया .
वह खोट यह था कि उत्पादन समाज के तात्कालिक उपभोग से बहुत अधिक होने लगा और उसे खपाना, उद्योग की निरंतर चलाये रखने के लिए एक आवश्यक शर्त बन गयी. यह सभ्यता में व्यापर और व्यापार-विनिमय में मुद्रा के चलन के बहुत बाद की बात है.
मनुष्य में कर्ज की अवधारणा के विकास के साथ ही मुद्रा का आविष्कार किया गया जिसने विनिमय को बहुत आसान बना दिया और उसकी गति भी तेज की. लेकिन बाद में, इसमें भी एक भारी खोट पैदा कर दिया गया. यह खोट उसे जारी करने वाले और उत्पादक श्रम से दूर रहने वाले एक वर्ग ने किया, जो चालाक और परजीवी था.
प्रेम से वंचित व्यक्ति, सत्ता और स्वीकार के लिए युध्दरत व्यक्ति, उत्पादन में सक्रिय भागीदारी न ले सकने की वजह से परजीवी ही होता है.
ऐसे परजीवी व्यक्तियों और समूहों ने ही समय के साथ मुद्रा के संवर्धन का नियम बनाया (जिसे आप ब्याज कह सकते हैं) और जरूरतमंद समूहों पर उसे आरम्भ में तो छल के माध्यम से, लेकिन बाद में ताकत के माध्यम से, उसे लागू किया.
आधुनिक सभ्यता के मूल में आये यही दो खोट बाद में कई तरह के असंतुलन का कारण बने जिन्होंने मनुष्य के दैनिक कार्य व्यापार को प्रभावित किया और कई तरह के युद्धों को जन्म दिया.
पहला-- बढ़ते उत्पादन को खपाने की चुनौती.
दूसरा --मुद्रा के कर्ज पर व्याज की अवधारणा के चलते उत्पन्न होने वाली कमी.
मौजूदा सभ्यता की हर समस्या इन्ही दो विसंगतियों की देन है.
दूसरी विसंगति को समझने के लिए इस पोस्ट के साथ-साथ ही जारी नीचे दिये गये लिंक में एक उदहारण पढना आवश्यक होगा जिससे आप वस्तु उत्पादन, मुद्रा, व्यापर और बैंकिंग के कील-पेंच आसानी से समझ आ जायेंगे.

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जिस तरह प्यार की कमी विग्रह और युद्ध को जन्म देती है, उसी तरह दैनंदिन मानवीय गतिविधियों में लगातार असफल होता आदमी परजीवी बनने की ओर मुड जाता है.
नतीजतन प्यार पाने और मानवीय कार्य-व्यापार में असफल आदमी युद्ध करने और गुलाम बनाने की तरकीबें करने लगता है.
इसी तरह सामाजिक पटल पर प्रेम के अभाव ने कर्ज की अवधारणा को जन्म दिया, जब किसी तरह की मानवीय सहायता या वस्तुओं के आदान प्रदान का लोग, लेखा-जोखा रखने लगे.
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1. कर्ज की अवधारणा
2. अनियंत्रित उत्पादन को खपाने की चुनौती.
3. मुद्रा के कर्ज पर व्याज की अवधारणा
इन तीन चीजों ने मिल कर, और निरंतर अनियंत्रित रहकर, मनुष्य के जीवन की दिशा बदल दी जिसे आज तक हम मोड़ नहीं सके है और निरंतर बढ़ते तकनीकी संजाल के चलते अब तो नियंत्रित भी नहीं कर सकते.
स्वतन्त्रता के मूढ़ पैरोकार नियंत्रण को ही स्वतन्त्रता का विलोम मानते है और यह नहीं समझते कि स्वतन्त्रता कोई अब्सोल्युट वैल्यू नहीं बल्कि बहुत से तत्वों पर निर्भर एक सापेक्ष धारणा है. आपकी स्वतन्त्रता तभी तक कायम रह सकती है जब तक की वह किसी दूसरे व्यक्ति की स्वतन्त्रता में बाधा न पहुंचाए.
नियंत्रण जरूरी है सभी मानव कर्म और वृत्तियों पर.
आखिर मनुष्य भी प्रकृति का ही एक अंग है और गौर से देखिये तो प्रकृति की संरचना में खुद ही स्व-नियंत्रण के उपादान मौजूद हैं और वह अपनी विसंगतियों को एक चक्रीय व्यवस्था के तहत नियंत्रित करती रहती है.
आज जो विसंगतियाँ हमें अपने समाज और जीवन में दिख रही हैं वे इसीलिए इतनी विकराल है क्योंकि हममें, उन्हें उनके आरम्भ में पहचानने की चेतना भी नहीं थी कि हम उन्हें नियंत्रित करने के कुछ उपाय करते.
और आज हम पूरी तरह से इन विसंगतियों की गिरफ्त में है और प्रेम से वंचित तथा परजीवी वर्ग पूरी तरह से हमारी सभ्यता पर काबिज है.
इस हद तक कि शक्ति का प्रदर्शन और प्रयोग, युद्ध में विजय और मनुष्य को गुलाम (नौकर) बनाना भी नैतिक मान लिया गया है.
यही नहीं,हर बड़ी और शक्तिशाली व्यवस्था अपने से छोटी व्यवस्था को लील लेना चाहती है और इसे नैतिक ही नहीं कानूनी मान्यता भी प्राप्त है.

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जनाब अगर ध्यान से देखिए तो समझ आ जायेगा
कि जीवन में प्यार और सफलता ही दुखों का मूल है :)
मैं कोई अध्यात्मिक बात नहीं कर रहा ठोस भौतिक और आर्थिक जगत की बात कर रहा हूँ, क्योंकि अध्यात्म के सहारे भी मानवता का कल्याण करने निकले लोग आखिरकार अपने भौतिक कल्याण में व्यस्त होकर आर्थिक शक्ति बन जाते हैं और उसके बाद राजनीतिक शक्तियों को भी उदरस्थ करने को तत्पर रहते हैं; तो क्यों न हम लोग आर्थिक मोर्चे की ही चर्चा में व्यस्त रहैं और पहले इसे ही बारीकी से समझें?
आखिरकार यही तो खुदा का दर है और सबको घूम फिर कर, लौट कर यहीं आना है, अपने-अपने ढकोसले और झंझट छोड़ कर. दूसरे लोक में स्वर्ग का दरवाजा खोलने वाले चित्रगुप्त भी हमारे कर्मों की "बैलेंस शीट" ही तो बनाते हैं !
तो बात यह थी कि प्यार और सफलता ही दुखों का मूल है--जिसके अभाव में मनुष्य क्रूर और परजीवी बनकर, समाज से कट कर उसके विरुद्ध हो जाता है, और वापस उसे जीत कर उन्हीं लोगों के बीच अपनी क्षमता को सिद्ध करने का प्रयास करने लगता है, जहाँ से उसे अस्वीकार और असफलता मिली थी.
जब कि प्यार और स्वीकार मिलते रहने से मनुष्य असफलता का दंश भूल कर वापस सामान्य जीवन में लौट सकता है.
जीवन के कार्य-व्यापार में श्रम के बाद मूल आवश्यकताओं की सहजता से पूर्ति और प्रेम की उपस्थिति जीवन में सकारात्मक स्पंदन बनाये रखती है.
लेकिन ऐसा हुआ नहीं, हमने असफल हुए लोगों अस्वीकार किया और उन्हें सहज प्रेम और सहयोग से जोड़े रखने के स्थान पर दिए गये सहयोग की मात्रा और मूल्य निर्धारित किये
तभी ऋण का आविष्कार हुआ और हमारी विकास यात्रा की दिशा बदल गई.
दरअसल ऋण ही हमारी आर्थिक दुनिया की सबसे पहली खोज है और मुद्रा दूसरी!


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यह, आगे आने वाली कहानी की पूर्व पीठिका का अंतिम पैराग्राफ है.
जरा अपनी आर्थिक दुनिया के विकास की सीढ़ियों को परखिये---
1. समाज में प्रेम, समावेशी वृत्ति की कमी और सामुदायिक विग्रह की शुरुआत
2. ऋण की अवधारणा का जन्म
3. विनिमय में आसानी के बहाने मुद्रा की खोज
4. समुदाय से विरत मनुष्यों द्वारा समुदाय के विरुध्द संघर्ष
5. परजीवियों द्वारा मौद्रिक ऋण पर व्याज की अवधारणा का जन्म
6. श्रम से असफल और समुदाय से विरत मनुष्यों द्वारा उपकरणों की खोज
7. मशीनों का विकास और मांग से अधिक उत्पादन में बढोत्तरी
8. अनियंत्रित उत्पादन और उसको खपाने की चुनौती.
9. मुद्रा आधारित विनिमय में अनावश्यक तेजी और बाजार का विकास
10. नए खपत क्षेत्रों और बाजारों की खोज का आरम्भ
यहाँ तक आते आते यूरोप के लोगों ने नयी दुनिया की खोज शुरू कर दी थी क्योंकि उनकी मशीनों का उत्पादन उनके बाजार की मांग से अधिक होने लगा था
हालाँकि इसके पहले चीन और भारत से यूरोप का व्यापार था लेकिन वह वास्तविक मांगों पर आधारित था.
परन्तु यूरोप में नित नयी मशीनों की खोज के चलते उत्पादन में आई भारी बढोत्तरी को खपाने की चुनौती उत्त्पन्न हुयी जिसको संघर्ष के माध्यम से अंजाम देते हुए व्यापार की दिशा मोड दी गयी जो आज तक कायम है.
अब इसके बाद हम अपनी कहानी उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से शुरू करेंगे, जब यूरोप एशिया और अफ्रीका में अपने उत्पादों को खपाने और यहाँ से प्राकृतिक सम्पदा को लूटने के खूनी खेल में व्यस्त था

शुरुआत: चिली में हस्तक्षेप और तख्तापलट

कोई साल भर पहले की बात है कि फेसबुक में एक मुक्त बाजार से सम्बंधित एक पोस्ट पर कोई अंट शंट कमेंट्स करने लगा… मैंने उसका जवाब दिया और साथ में कहा कि “अरे भाई कोई इन्हें चिली का इतिहास पढाओ रे!”  इसके जवाब में मेरे मित्र शशि भूषण सिंह ने कहा कि जो अपना इतिहास नहीं पढ़ते उनसे आप चिली का इतिहास पढने को कह रहे हैं.अगले दिन मैंने इस बात की गंभीरता को सोचा और अपने देश की वर्तमान उथलपुथल को देखा तो  दोनों में काफी साम्य दिखाई दिया. (आज यह अधिक स्पष्ट होता जा रहा है ) ऐसा ही तो चिली में अमेरिका ने किया था. दरअसल यहीं से अर्थसत्ता के सूत्र खुले और या निश्चय किया गया कि पूँजी के आवारा और विध्वंसक का चरित्र चित्रण किया जाना चाहिए. और यह भी की राज्यसत्ता और अर्थसत्ता पिछले पांच सौ सालों से एकमेक होकर सामान्य जानो पर कैसे सवारी गाँठती आई हैं और इसका तोड़ जो भी बनाना या बनना चाहता है वो खुद तोड़ दिया जाता है या टूट जाता है. सोवियत रूस  के बनाने और टूटने को को भी आप इसका एक उदहारण भर ही समझें .. 1917 की क्रांति को भी आंशिक रूप से  अमेरिकी पूँजी ने भी प्रायोजित किया था…. जिसके दस्तावेजी सबूत भी मौजूद है.. खैर अर्थसत्ता की पोस्ट्स लिखी गयीं, जिन्होंने पढ़ा, पसंद किया, और जिन्होंने नहीं पढ़ा उन्होंने उसमे मोदी विरोध सूंघ कर उसे रिपोर्ट कर  फेसबुक ID ब्लाक करवाई. अब इस ब्लॉग पर फिर वही कहानी और अधिक विस्तार  से पढ़िए , थोडा कीजिये फिर और गहरे उतरते हैं फिलहाल ये थी अर्थसत्ता की पहली पोस्ट — 
“कल शशिभूषण जी ने ठीक कहा कि जो अपना इतिहास नहीं पढ़ते वे चिली का क्या पढ़ेंगे। मुझे भी इस मूर्खों और धूर्तों की टुकड़ी से कोई उम्मीद नहीं है। जो इनके पहले थे उनसे भी नहीं थी, क्योंकि वे तो अर्थशास्त्र के पंडित थे। ट्रेकिल डाउन और जाने कौन कौन से पोंगा सिद्धांत बघारते थे और फ्री इकॉनमी को वरदान मानते थे कि जैसे यही अब हर हिन्दुस्तानी की जिंदगी को जगमग कर देगी।
पर हमारे हुक्मरान कभी भी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक दबावों के आगे घुटने टेकने के अलावा कोई विकल्प नहीं पेश कर सके। यह उनके बस की बात ही नहीं थी। दरअसल फ्री मार्किट के एजेंट 1975 के पहले ही भारत घुसपैठ कर चुके थे और वे विभिन्न स्तरों पर लॉबीइंग करके या सीधे हस्तक्षेप द्वारा सरकारी निर्णयों को प्रभावित कर रहे थे। याद रखिये कि यही वह जमाना था जब अमेरिका में भी इकनोमिक डेरेगुलशन शुरू हुआ और वहां का अर्थतंत्र पूंजीवाद के सबसे खतरनाक दौर में प्रवेश कर गया, और उत्पादन, निर्माण और विपणन का नियंत्रण परोक्ष रूप से मेन स्ट्रीट से छीनकर वाल स्ट्रीट ने हथिया लिया था ।
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अब चिली की बात पर आते हैं और ये देखते हैं की वह क्यों हमारे लिए आज प्रासंगिक है।
1950 -60 में चिली ठीक ठाक तरक्की पर था बिना किसी बाहरी मदद के। शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ राष्ट्र निर्माण के प्रमुख उद्योग पूरी तरह राज्य के नियंत्रण में थे। (बताना जरुरी है कि चिली १८१० में आजाद हुआ और स्वशासन के दो प्रमुख काल खण्डों से गुजरते हुए उसने 1891 से ही संसदीय प्रणाली अपना ली थी और 1925 से Arturo Alessandri Palma. के सुधारवादी नेतृत्व में मजबूत हो रहा था) वहाँ के मजबूत होते कामकाजी मध्यवर्ग को “ईवोलूशन टू अवॉयड रेवोलुशन” के नारे के तहत संगठित किया जा रहा था। एक ऐसे दौर में, जब उसके पडोसी दक्षिण अमेरिकी देश भी उससे रश्क करने लगे थे; वहां पांव जमाये अमेरिकी कंपनियों को अपने लिए खतरा महसूस होना  शुरू हो गया।
इसके पहले ही अमेरिका में 1929 की भयानक मंदी को मार भागने के लिए रूज़वेल्ट द्वारा “न्यू डील” की घोषणा की जा चुकी थी और अमेरिकी सरकार बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार मुहैय्या कराने का बीड़ा न केवल उठा चुकी थी बल्कि करा भी रही थी। इसी वजह से अमेरिकी पूंजीपति और उनके पिछलगुए अर्थशास्त्री भी कनमना रहे थे, जिनमें सबसे प्रमुख थे शिकागो यूनिवर्सिटी के मिल्टन फ्रीडमैन। उन्होंने पूंजीपतियों के हक़ के लिए “न्यू डील” का युद्धस्तर पर विरोध शुरू कर दिया।
इसके कुछ पहले यूरोपीय/अमरीकी पूंजीपतियों के पिछलगुए अर्थशस्त्रियों द्वारा एक संगठन की स्थापना भी हो चुकी थी जिसका नाम था –“मोंट पेलेरें सोसाइटी”; इसका एकमात्र उद्देश्य था –समस्त व्यापारिक और औद्योगिक उपक्रमों से सरकारी नियंत्रण हटवाना। फ्रीडमन उसका सक्रिय सदस्य था और ऑस्ट्रिया का अर्थशास्त्री फ्रेडरिक वोन हायक अध्यक्ष। इस सोसाइटी ने एक पोंगा सिद्धांत निकाला और उसे न केवल प्रचारित किया बल्कि संगठित रूप से लागू करने के लिए दुनिया की सभी सरकारों पर परोक्ष दबाव बनाने की भी शुरुआत की। कहना न होगा कि इसके पीछे दुनिया के सभी प्रमुख पूँजीपतियों ने समर्थन और धन लगाया।
यह पोंगा सिद्धांत था कि “यदि सरकारें अर्थतंत्र से अपना समस्त नियंत्रण हटा कर उसे पूरी तरह मुक्त कर दें तो अर्थ व्यवस्था स्वयं ही अपने को सन्तुलित करती रहेगी “. … इसके बाद ही मुक्त बाजार और मुक्त अर्थव्यवस्था के खेल की शुरुआत हुयी . ….1950 के शुरूआती विरोध के बाद सभी अमेरिकी अयोग्य सरकारों को यह सिद्धांत तुरंत भा गया और दूसरों ने भी इसमें अपनी मुक्ति देखनी शुरू की।

अब पुनः चिली पर आते हैं—- तो चिली के आत्मनिर्भर बनते चले जाने और सरकार द्वारा पोषित उपक्रमों के पुष्ट होते जाने के दौरान वहां पांव पसारे पूंजीपतियों को अपनी तरक्की में बाधा महसूस हुयी और उन्होंने अपने एजेंट मिल्टन फ्रीडमन को सक्रिय किया। फ्रीडमन ने अमेरिकी सरकार के साथ मिलकर अपने लम्बे और सुनियोजित प्लान के तहत चिली की कैथोलिक यूनिवर्सिटी से मेधावी छात्रों को जहाज भर-भर कर  मुक्त बाजार की शिक्षा के लिए शिकागो यूनिवर्सिटी बुलाना शुरू किया । सालों तक चले इस उपक्रम के बाद सैकड़ों की संख्या में मुक्त बाजार के पैरोकार तैयार होकर चिली पहुचने लगे और वहां के सरकारी, अर्धसरकारी और निजी संस्थानो में अपनी जगह बनाने लगे।
यही नहीं कैथोलिक यूनिवर्सिटी का अर्थशास्त्र विभाग पूरी तरह से शिकागो यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग का क्लोन बन गया और इसके मुखिया अर्नाल्ड हरबेर्गेर बन गए फ्रीडमन के भक्त ।
इसका नतीजा सत्तर के दशक की शुरुआत से सामने आया जब नयी चुनी गयी सरकार (राष्ट्रपति: साल्वाडोर अलेंदे गोसेंस) को गिराने का प्रयास अमेरिका द्वारा किया जाने लगा। अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन ने सीआईए को चिली में आर्थिक अस्थिरता पैदा करने का साफ़ निर्देश दे दिया। इसका एक मात्र कारण था नयी सरकार द्वारा अमेरिकी पूंजी द्वारा संचालित उपक्रमों का राष्ट्रीयकरण करने का प्रयास (क्योंकि जाहिर है,  इससे अमेरिकी पूँजी  की पकड़ चिली के पर कमजोर होती या ख़त्म होती)।
उस समय चिली के टेलीकॉम , बैंकिंग, माइनिंग आदि सभी प्रमुख क्षेत्रों का या तो राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था या उनमें सरकारी हस्तक्षेप बढ़ाया जा रहा था जिसके फलस्वरूप नयी सरकार के कार्यकाल के पहले साल में अच्छी आर्थिक प्रगति भी हुई थी.
इधर अमेरिका के सरकारी पैसे, सीआईए और चिली की कैथोलिक यूनिवर्सिटी के मुक्त बाजार सेवक-शावकों द्वारा एक ५०० पेज का ब्लू प्रिंट तैयार किया गया जिसका नाम था -“ब्रेक “। इसके तहत बड़े पैमाने पर हड़ताल कराना, आम लोगों में भय पैदा करके उन्हें बैंकों से जमा पूँजी निकालने की उकसाना आदि के माध्यम से अस्थिरता/अशांति पैदा की गयी और असफल तख्तपालट की एक कोशिश हुयी। अमेरिकी पूंजीपतियों ने भी अपने पैसे बाजार से निकाल कर कृत्रिम आर्थिक संकट पैदा किया गया जिससे मुद्रास्फीति पहले 140% और फिर 800% तक पहुंच गयी।
जिस चिली ने 40 साल शांतिपूर्ण लोकतान्त्रिक शासन के बिताये थे उसकी गलियों में मिलिटरी की संगीनें लहराने लगी और इसकी चरम परिणति राष्ट्रपति भवन पर सीधे हमले द्वारा साल्वाडोर अलेंदे गोसेंस की सरकार को उखाड़ फेंकने में हुयी।
आज भारत में वही अभियान सक्रिय है, बेशर्म समझौतों द्वारा कुशिक्षित राजनेताओं को फुसलाया जा रहा है या तो धमकाया जा रहा है; चिली में तो शिक्षा को प्रायोजित किया गया था, भारत में तो अब सीधे हस्तक्षेप कर खरीदा जा रहा है। हमारे कुशासक पहले इसे अपरिहार्य बता रहे थे और आज निहाल हुए जा रहे हैं और हाथ उठा-उठा कर मेक इन इंडिया कर रहे हैं।
ठीक भी है, वायरस पहले ठीक दिमाग में घुसाओ, इंसान को पागल करो बाकी  बीमारियां वो अपने आप पैदा कर लेगा। धर्म को भ्रष्ट करना है, पंथ चलाना है तो पहले अपने पुरोहित पैदा करो …….
एक बच्चे ही हैं  जो इस बात को समझ रहे है और विरोध में जान की बाजी लगा रहे हैं, लाठियां खा रहे है।
हुक्मरान कुशिक्षित हैं, मूर्ख हैं, बिके हुए हैं, बेहया हैं या यह सब होने के साथ क्रूर भी हैं……फिलहाल इस देश के पक्ष में नहीं हैं। ..और अर्थशास्त्र के बुनियादी सिद्धांतों को उतना भी नहीं जानते मानते जितना गली का एक व्यापारी अपनी सहज बुद्धि से ही जनता है।

इस बात को शायद छात्र समझ रहे है। थोड़ी बहुत उम्मीद भी उन्ही से है।